कबीर-लोई की प्रेम कहानी पर Pratap Somvanshi का Play 'लोई: चले कबीरा साथ' | EP 583 | Sahitya Tak
'लोई' कौन थीं, और कैसे जुड़ी थीं कबीर से? उनका और संत कबीर का रिश्ता क्या था? प्रेमी-प्रेमिका का? पति-पत्नी का? गुरु-शिष्या का? पत्रकार और संपादक प्रताप सोमवंशी की लोई के जीवनकर्म और कबीर से उनके संबंधों पर एक नाट्य-पुस्तिका आई है 'लोई: चले कबीरा साथ'. लगभग 600 वर्ष पूर्व एक अति साधारण मल्लाह की बेटी के रूप में लोई का जन्म हुआ था.लोई कबीर की पत्नी, दोस्त, भक्त के रूप में जानी जाती हैं. यह नाटक सूत्रधार के इस सवाल से शुरू ही होता है कि लोई कौन है? इसके बाद सोमवंशी का यह दृष्टिकोण सामने आता है, जिसमें वह बताते हैं कि इस कृति को इसीलिए लिखा गया ताकि आप लोई को पढ़ते-देखते समय एक भारतीय स्त्री की कहानी पढ़ें. लोई को बिना कबीर के देखना मुमकिन नहीं है, लेकिन कबीर बरगद की विशालता लिये हुए आते हैं, तो लोई उनकी जिंदगी में छांव की बेल की तरह आती है, जिसका अस्तित्व ही नहीं पता चलता है.
प्रताप सोमवंशी की इस पुस्तक के बारे में चित्रा मुद्गल लिखती हैं कि इसे पढ़ते हुए सैकड़ों साल पहले पैदा हुई वह मल्लाह की बेटी लोई मेरे सामने आ खड़ी हुई, स्त्री के अबला व्यक्तित्व पितृसत्ता द्वारा प्रचारित रूढ़ मिथ को तोड़ती हुई. एक आभासी काया के रूप में कहती हुई, मेरी ओर देखो. मैं पितृसत्ता के द्वारा गढ़ी गयी उनके संकेतों की दास स्त्री नहीं हूं. मैं वह स्त्री हूं, जिसने अपने हाथों से समय के संक्रमणों के बीच स्वयं को गढ़ा है. मैंने मीरा की तरह स्वयं को अन्वेषित किया है, ज़हर का प्याला हंसते-हंसते कण्ठ से नीचे उतारा है. मैंने महाभारतकाल में स्त्री- अस्मिता के प्रश्नों से पाण्डव और कौरव कुल को कठघरे में खड़ा करने वाली स्वतंत्रचेता द्रौपदी के साथ-साथ इतिहास के उन पन्नों को केवल जिया ही नहीं है, बल्कि गवाह हूं उस चौसर के दांव का, जिसने मेरे भीतर के हवन कुण्ड को प्रज्वलित कर दिया अपनी अस्मिता के प्रतिकार के लिये. हां, मैं वही लोई हूं." यह यों ही नहीं कि कवि कहलाने और काव्य सृजन में पारंगत सोमवंशी जब लोई को अपनी पारंगत विधा में नहीं उतार पाए, तो नाट्य विधा का सहारा लिया और इस कृति से सामने आए.
साहित्य तक पर पुस्तकों को समर्पित बुक कैफे के 'एक दिन एक किताब' कार्यक्रम में वरिष्ठ पत्रकार जय प्रकाश पाण्डेय ने आज कवि, लेखक, संपादक प्रताप सोमवंशी की नाट्य पुस्तक 'लोई: चले कबीरा साथ' की चर्चा की है. 156 पृष्ठों की इस पुस्तक को वाणी प्रकाशन ने प्रकाशित किया है, जिसका मूल्य 399 रुपए है.