Book Cafe EP 420 : Ramdarash Mishra के चुने हुए निबंध | 'फिर लौट आया हूँ मेरे देश' | Sahitya Tak

हमारे हाथ में सोने की नहीं

सरकडे की कलम है.

सरकंडे की कलम

खूबसूरत नहीं, सही लिखती है

वह विरोध के मंत्र लिखती है

प्रशस्ति पत्र नहीं लिखती है...

'फिर लौट आया हूँ मेरे देश' यह निबंध-संग्रह रामदरश मिश्र के ललित निबंधों का संकलन है. निबंध रामदरश मिश्र की मुख्य रचना विधा नहीं रहा है. किन्तु समय-समय पर वे ललित निबन्ध भी लिखते रहे हैं. मिश्र ने कई विधाओं में रचना की है. कव्य ने जिस विधा की मांग की, उसके साथ वो आसानी से ढल गए. इसका एक कारण वह कहते हैं कि हर विधा की रचना की मांग सहज भाव से उनके अंतर से उपजी है अतः उसमें अपनापन है. कथ्य हो या शिल्प सभी में मिश्र का अपनापन है. उनकी केन्द्रीय विधा कविता और कथा की प्रासंगिक उपस्थिति ने उनके निबंधों को अपनी छवि प्रदान की है. मिश्र ने अनेक विषयों और अनुभवों को लेकर निबंध - रचना की है. प्रमुखतः सब में अपने गांव के विविध आयामों के साथ वे रहे हैं .गांव की प्रकृति, तीज त्योहार, ऋतुएं मौसम, अभाव संघर्ष, सुख दुख, रूढ़िग्रस्तता, मूल्य-चेतना और विविध प्रकार के कर्म इन निबंधों में उतरते रहे हैं. जन-जीवन से जुड़े हुए अन्य अनेक संदर्भ मिश्र के भीतर उतर-उतर कर निबंध का रूप लेते रहे हैं. रामदरश मिश्र कवि, कथाकार, समीक्षक, कई रूपों में विख्यात हैं. उनके ललित निबन्धों के अब तक चार संग्रह 'कितने बजे हैं' (1982 ई0), 'बबूल और कैक्टस' ( 1998 ई०), घर परिवेश (2003 ई0) और 'छोटे-छोटे सुख' (2006 ई०) प्रकाशित हो चुके हैं. श्री मिश्र के संस्कार ठेठ गांव के हैं. गांव, जहां जीवन का अक्षय राग स्रोत निरन्तर प्रवाहित होता रहता था. अब तो गांव भी बदल गए हैं. गांव का जीवन भी व्यावसायिकता और राजनीति से विरूप हो गया है. अपनी ठेठ ग्रामीण संवेदना और जीवन-मूल्यों से जुड़े रहकर मिश्र जी ने आज के मनुष्य को प्रभावित करने वाले बुनियादी प्रश्नों पर विचार किया है. सांस्कृतिक मूल्यों की विद्रूपता पर क्षोभ व्यक्त किया है और सब मिलाकर मनुष्य से मनुष्य को जोड़ने वाली सहज राग-चेतना के निरंतर छीजने पर चिन्ता व्यक्त की है. उनके दूसरे निबंध संग्रह में 'बबूल' ठेठ ग्रामीण चेतना का प्रतीक हैं और 'कैक्टस' आधुनिक यांत्रिक सभ्यता का बबूल आज भी अपनी ठेठ ग्रामीण संवेदना को संजोये श्री मिश्र को आकर्षित करता है. उन्हें दुख इस बात का है कि अब किसान भी अपने इस चिरसखा की उपेक्षा करने लगे हैं. 'घर परिवेश' में कुल 20 निबन्ध संग्रहित हैं. निबन्धों में वैविध्य है. कुछ संस्मरणात्मक हैं, कुछ यात्रावृत्त हैं और कुछ विचार-प्रधान भी हैं. इनमें एक तत्व सर्वव्यापी है- वह है 'लालित्य 'छोटे-छोटे सुख' में कुल 15 निबन्ध संगृहित हैं. प्रायः सभी आत्म-व्यंजक हैं.शैली में वैविध्य है. इन निबन्धों में मिश्र अपनी ग्रामीण चेतना के साथ सर्वत्र विद्यमान हैं. वरिष्ठ पत्रकार जय प्रकाश पाण्डेय ने बुक कैफे के 'एक दिन एक किताब' कार्यक्रम में सर्व भाषा ट्रस्ट द्वारा प्रकाशित 'फिर लौट आया हूँ मेरे देश' पर अपनी राय रखी है. रामदरश मिश्र इस पुस्तक के लेखक हैं. कुल 208 पृष्ठों की इस पुस्तक का मूल्य 750 रुपए है.