Book Cafe EP 421: पथ ही मुड़ गया, Rape से जो बदल जाता है Girls Life में | Jyoti Kumari | Sahitya Tak

यौन उत्पीड़न शब्द सुनने में जितना असहज है उससे कई ज़्यादा घृणास्पद. हमारे समाज में यौन उत्पीड़न की समस्याएं दिन प्रतिदिन बढ़ता जा रही हैं और ऐसा नहीं कि इसको लेकर कोई सख्त कदम नहीं उठाए जाते मगर फ़िर भी विषैली मानसिकता के शिकार लोग इन सब से परे वहशीपना लेकर घूमते ही हैं. यौन उत्पीड़न का प्रभाव महज़ शरीर तक ही नहीं अपितु मन पर चोट करता है. बाली उम्र में ही अपना बचपन खो देने वाली लड़कियां समाज के इस विषैलेपन को जब तक समझने लायक होती हैं तब तक बहुत देर हो चुकी होती है. और यही कारण है कि हमें अवसाद और आत्महत्या के मामलों में वृद्धि देखने को मिलती है जो कि चिंता का विषय है. इन्हीं कुरीतियों और सामाज में फैले ज़हर पर चोट करती है ज्योति कुमारी की किताब 'पथ ही मुड़ गया'. इस किताब की सबसे अनोखी बात ये है कि ये कहानी नहीं है लेकिन एक नाटक है जिसके द्वारा समाज को आइना दिखाने की कोशिश करी गई है. ज्योति की पुस्तक 'पथ ही मुड़ गया' यौन उत्पीड़न की शिकार उन तमाम अबोध बच्चे-बच्चियों को समर्पित है जिनका जीवन दूसरों के जुर्म के वजह से नारकीय हो गया.' यह किताब कई मायनों में अलग है. इसमें हर पात्र की अपनी एक कहानी है, जो आपको गहन विचार करने पर मजबूर करती है. ऐसे में ये समझना अहम हो जाता है कि यह कुकर्म चक्र आखिर कब तक चलेगा और इस पर अंकुश लगाने को और कितनी जद्दोजहद करनी पड़ेगी. इसी विमर्श को ध्यान में रखते हुए आज 'बुक कैफे' के 'एक दिन एक किताब' कार्यक्रम में वरिष्ठ पत्रकार जय प्रकाश पाण्डेय ने इसी अहम किताब 'पथ ही मुड़ गया' के बारे चर्चा की है. इसकी लेखिका ज्योति कुमारी हैं जो कि अनेक किताबों का अनुवाद कर चुकी हैं और भुवनेश्वर कथा सम्मान से भी सम्मानित हो चुकी हैं. कुल 29 परिदृश्यों में विभाजित इस नाटक में 95 पृष्ठ हैं, जिसका मूल्य 200 रुपए है. आप अगर रंगमंच की दुनिया से राब्ता रखते हैं और गंभीर विषयों पर आधारित नाटक पढ़ना चाहते हैं तो यह किताब आपके लिए है. पुस्तकों पर आधारित हमारा यह कार्यक्रम देखते रहें सिर्फ़ साहित्य तक पर.