Book Cafe EP 422: Art World पर Dr Ranjit Saha की 'आधुनिक भारतीय चित्राकला की रचनात्मक अनन्यता'

कला जगत पर हिंदी में बहुत कम पुस्तकें हैं. ऐसी पुस्तकें जो भारतीय कलाकारों के जीवन, उनकी शैली, शिल्प के बारे में बताती हों, वे तो और भी कम हैं. आधुनिक भारतीय कला-परिदृश्य को बहुधा भारतीय पुनर्जागरण या प्रबोधन के सन्दर्भ में पारिभाषित किया जाता रहा है. बीसवीं सदी के आगमन के साथ, आधुनिक भारतीय कला-दृष्टि सम्पन्न, सजग और संघर्षरत कला सर्जक विषय-वस्तु, माध्यम, उपकरण आदि के साथ अपनी भूमिका को सार्थक करने में जुट गए. वाणी प्रकाशन द्वारा प्रकाशित डॉ. रणजीत साहा की पुस्तक 'आधुनिक भारतीय चित्रकला की रचनात्मक अनन्यता' में काल की कसौटी और कला पर खरे उतरे कई विशिष्ट हस्ताक्षर सम्मिलित हैं. ऐसे कलाकार जिन्होंने अपने अदम्य संघर्ष और अनन्य संकल्प के बूते आधुनिक भारतीय कला को नया शिखर प्रदान किया है. अपनी अभिनव भूमिका में न केवल उन्होंने स्वयं अपना आविष्कार किया है बल्कि भारतीय चित्रकला को रचनात्मक अनन्यता भी प्रदान की है. अब एम. एफ. हुसेन, मनजीत बावा, एस. एच. रजा, यूसुफ अरक्कल, रामकुमार, कृष्ण रेड्डी, के. जी. सुब्रमण्यन, सतीश गुजराल, जय झरोटिया आदि की कीर्ति, स्मृति और उनकी कलाकृतियां ही हमारे लिए बची रह गई हैं. इस पुस्तक में कुछ विशिष्ट और महत्त्वपूर्ण चित्रकार सम्मिलित होने से रह गए हैं. ऐसे भी कुछ चित्रकार हैं जो चित्रकला के अलावा अन्य कला विधाओं में कार्यरत हैं. लेखक के मुताबिक पुस्तक के कलेवर को ध्यान में रखकर ही उन्हें शामिल नहीं किया जा सका. लेकिन प्रयास इस बात का किया गया कि बीसवीं सदी के प्रमुख हस्ताक्षरों में से कोई छूटने न पाए. यह पुस्तक एक योजना, जो लगभग दस वर्ष पहले शुरू हुई थी, की सुखद परिणति है. इस योजना के प्रारूप को अशोक वाजपेयी, जो उन दिनों ललित कला अकादमी के अध्यक्ष थे, की सराहना प्राप्त हुई थी. रवि वर्मा (1848-1906) के बाद, आधुनिकता के संस्पर्श से कला-सृजन के क्षेत्रा में गुणात्मक परिवर्तन आया, जिसे अवनीन्द्रनाथ ठाकुर, नन्दलाल बसु, रवीन्द्रनाथ, अमृता शेरगिल, जामिनी राय और उन परवर्ती चित्रकारों में लक्ष्य किया जा सकता है, जिन्होंने प्राच्य और पाश्चात्य कलादर्शों से अलग हटकर, अपनी राह अन्वेषित की और रचनात्मक पहचान स्थापित की. विभिन्न कला-आन्दोलनों और चित्रण शैली से गुज़रती हुई, भारतीय कला ने बीसवीं सदी के चालीस-पचास दशक तक अपना एक मुकाम तय कर लिया था. इन कलाकारों की रचनात्मक अनन्यता इस अर्थ में भी महत्त्वपूर्ण है कि सार्वदेशिक, सर्वकालिक और सार्वजनीन होने का कोई दावा न करते हुए भी इन्होंने अपनी कृतियों या निर्मितियों को ही ‘स्व’ का विस्तार माना. पुस्तक में इस बात का विशेष ध्यान रखा गया है कि आधुनिक भारतीय चित्रकला की पहचान को निर्धारित करने में कौन-कौन से आन्तरिक तत्त्व और बाह्य प्रभाव हावी रहे. साथ ही, किसी चित्रकार के निर्माण में उसके देशकाल और स्वयं उसकी निजता ने कितना सहयोग किया. इन सभी कलाकार के जीवन को जब आप पढ़ेंगे तो उससे गुज़रते हुए आपको ऐसा प्रतीत होगा कि पारिवारिक अभाव, सामाजिक अनदेखी, संस्थागत अवहेलना या अस्वीकृति के बावजूद, उनके संकल्प और आत्मसंघर्ष ने उन्हें आगे बढ़ने के लिए प्रेरित किया. जो चित्रकार सम्पन्न परिवारों से आए थे, उन पर भी अपनी निजी शैली और कला संसार में अपनी निरन्तर उपस्थिति बनाए रखने का दबाव बना रहा. कुछ कलाकार इस मामले में भाग्यशाली रहे कि उन्हें उसी कला संस्थान में नौकरी मिल गयी, जहां उन्होंने अध्ययन किया था या फिर किसी दूसरे संस्थान में. यह अपने आप में विचारणीय विषय है कि क्या इससे उनका कला व्यक्तित्व विकसित हुआ या कहीं जाकर ठहर गया. यह भी देखा गया कि जो निर्बन्ध ढंग से काम करते रहे, वे कला के क्षेत्र में अधिक प्रयोग-प्रवण और चुनौतीपूर्ण कार्य योजना को सफलतापूर्वक सम्पन्न कर पाए. ऐसे ही विशिष्ट चित्रकारों पर विचार करते हुए उनकी व्यक्तिगत समस्याओं, कठिनाइयों और उपलब्धियों के साथ उनकी विशिष्टता का आकलन एवं विश्लेषण इस पुस्तक में किया गया है. जिन लोगों की भारतीय कला जगत में रुचि है और जो लोग कलाकारों के बारे में जानना चाहते हैं उन्हें यह पुस्तक अवश्य पढ़नी चाहिए. वरिष्ठ पत्रकार जय प्रकाश पाण्डेय ने 'बुक कैफे' के 'एक दिन एक किताब' कार्यक्रम में आज वाणी प्रकाशन द्वारा प्रकाशित डॉ. रणजीत साहा की पुस्तक 'आधुनिक भारतीय चित्राकला की रचनात्मक अनन्यता' पर अपनी राय रखी है. खास आकार में छपी इस पुस्तक में कुल 364 पृष्ठ हैं और इस पुस्तक का मूल्य 695 रुपए है.