Gandhi Katha : गांधी के गांधियों का प्रसंग | गांधी ही गांधी | Arvind Mohan | EP 497 | Sahitya Tak

हे राम!

गांधी कथा का यह चौथा भाग है. गांधी बनना मुश्किल था या है तो गांधी के गांधियों में शामिल होना भी कोई साधारण बात नहीं है. इसलिए गांधी जी के शहीद दिवस तक आपको बुक कैफे के 'एक दिन एक किताब' कार्यक्रम में वरिष्ठ पत्रकार जय प्रकाश पाण्डेय गांधी जी के कई किस्सों एवं कहानियों पर आधारित गांधी कथा पुस्तकों की श्रृंखला से रूबरू कराते रहेंगे. सेतु प्रकाशन से आई 'गांधी कथा' पुस्तकों की श्रृंखला में आज 'गांधी ही गांधी' की चर्चा की गई है. जिसके लेखक हैं अरविन्द मोहन जो कि जाने-माने पत्रकार, लेखक एवं संपादक हैं. और गांधी जी के जीवन पर काफ़ी शोध कार्य कर चुके हैं. 'गांधी कथा: गांधी ही गांधी' यह भाग गांधी के गांधियों का है. जिसको लेकर अरविन्द मोहन का कहना है की मोहनदास करमचन्द गांधी के पहले भी गांधी थे, तो लाज़िम है कि बाद में भी होंगे ही. गन्ध का कारोबार करने वाले गांधी कहलाए. लेकिन मुश्किल यह है कि मोहनदास गांधी के बाद अचानक गांधियों की संख्या तेजी से बढ़ गयी. यह उस गांधी के प्रति आदर और श्रद्धा से भी हुआ है और गांधी के नाम को आगे करके अपने कुकर्मों को छुपाने या उस नाम से बनी आम जन के मन की श्रद्धा का दुरुपयोग करने के लिए भी हुआ है. इस बीच फिरोज गांधी से नेहरू परिवार का ऐसा रिश्ता जुड़ा कि नेहरू भी गांधी बन गए. और इनका अपना यश, अपयश है. और उस बड़े गांधी से तो इनका रिश्ता है ही. उसी गांधी ने नेहरू को आगे किया था. इसलिए गांधी के गांधियों का अलग हिसाब-किताब जरूरी है क्योंकि इन्होंने भी उस गांधी को बड़ा बनाने में अपना-अपना योगदान दिया है. गांधी जितना न सही लेकिन अपनी पूरी क्षमता भर पूरे समर्पण से समाज का काम किया है, गांधी के मूल्यों को आगे बढ़ाया है. मोहनदास करमचंद गांधी नामक यह सूर्य ऐसा है कि उसकी रोशनी में बाकी सारे गांधी तारों की तरह छुप जाते हैं. बल्कि वे खुद भी इस कोशिश में दिखते हैं कि उनकी चर्चा न हो. गांधी कथा में अगली कड़ी इस श्रृंखला की आखिरी कड़ी है. यदि आप गांधी के जीवन, उनके आदर्शों, गांधी की सीख या गांधी कैसे बने महात्मा गांधी इस बात को समझना चाहते हैं. तो अरविन्द मोहन की 'गांधी कथा: गांधी ही गांधी' पुस्तक महत्वपूर्ण है. आज बुक कैफे के 'एक दिन एक किताब' कार्यक्रम में वरिष्ठ पत्रकार जय प्रकाश पाण्डेय ने इसी पुस्तक की चर्चा की है. सेतु प्रकाशन से प्रकाशित इस पुस्तक में 172 पृष्ठ हैं और इस पुस्तक का मूल्य 225 रुपए है.