मुसाफ़िर हैं हम भी... Akanksha Ambasta से सुनें Love Lessons | सलाम-ए-इश्क 11 | Sahitya Tak

मुसाफिरों की बस्ती में,

हम एक ऐसे मुसाफिर थे,

पुरानी दुनिया छोड़ देना क्या जरूरी है, यही सवाल हर किसी से पूछा करते थे. हालांकि मुसाफिर खुद को कभी यह समझकर आगे बढ़ता नहीं कि वह एक मुसाफिर है या फिर किसी मंजिल की उसे तलाश है. ये तो दुनिया होती है जो उसे ये नाम देती है. असलियत में तो मुसाफिर अपनी धुन में चलना चाहते हैं. दुनिया उसे क्या नाम देती है, किस नाम से पुकारती है, इसे उन्हें कुछ फर्क नहीं पड़ता.

उमर अंसारी ने इस पर क्या खूब कहा है...

मुसाफ़िरों से मोहब्बत की बात कर लेकिन

मुसाफ़िरों की मोहब्बत का ए'तिबार न कर...तो आज बात मुसाफिरों की हो रही है. उनकी किस्मत भी कितनी अजीब होती है, चाहे जिंदगी में कुछ मिले या ना मिले, किसी की चाहत हो या ना हो उनको आगे बढ़ते ही रहना पड़ता है. वो रुक नहीं सकते हैं, वो पीछे मुड़कर शायद जरूर देख सकते हैं, मगर वो थम नहीं सकते, आगे बढ़ते रहना ही उनकी किस्मत होती है. या यूं कहें कि चलना उनके वजूद का हिस्सा होता है...ठीक ऐसे -

जीवन चलने का नाम, चलते रहो सुबहो शाम... साहित्य तक पर आकांक्षा अंबष्ट से सुनें मुसाफ़िर के अतरंगी किस्से.


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इस आवाज में एक जादू है. वह जादू जिसकी तपिश से बचना मुश्किल है. पर क्या यह केवल आवाज़ का असर है या उसमें छिपी कशिश का भी... साहित्य तक आपके लिए लेकर आया है शब्दों से अठखेलियां कर आपके जीवन में रास-रंग उत्साह और कभी कभार तन्हाई में सहारा देने वाली बातूनी को. हर सप्ताह सुनेंगे आप यहां 'शब्द का, प्यार का फलसफा. आज का शब्द है- मुसाफ़ि