स्त्री को समाज पैदा करता है! Simone de Beauvoir | Shruti Agarwal | औरतनामा | Sahitya Tak


9 जनवरी पेरिस में जन्मीं सिमोन द बोउआर दुनिया की पहली नारीवादी चिंतक और विचारक थीं, जिन्‍होंने स्त्रियों की समस्‍या को पहली बार इतिहास, विज्ञान और दर्शन के साथ समायोजित कर आर्थिक-सामाजिक संदर्भों में उसकी व्‍याख्‍या की. वे फ़्रांस की ऐसी लेखिका थीं जिन्होंने अपने विचारों के अनुसार जीवन जीने का साहस भी दिखाया. सिमोन का पालन-पोषण एक सख्त कैथोलिक घराने में हुआ था. युवावस्था में, उन्हें कॉन्वेंट स्कूलों में भेजा गया. वह एक बच्चे के रूप में गहरी धार्मिक थी. लेकिन 14 साल की उम्र में, सिमोन ने अपने विश्वास पर सवाल उठाया नतीजतन, उसने अपनी शुरुआती किशोरावस्था में अपने विश्वास को त्याग दिया और जीवन भर नास्तिक बनी रही. सन 1927 में उन्होंने दर्शन की डिग्री ली. 1928 में एकौल नौमाल सुपेरियर में दर्शन में स्नातकोत्तर के लिये दाखिला लिया. जहां उन्होंने पहली बार घर के बंधनों से दूर आजादी की खुली सांस ली. उनका कहना था की स्त्री पैदा नहीं होती, उसे समाज द्वारा बनाया जाता है. सिमोन का मानना था कि स्त्रियोचित गुण दरअसल समाज व परिवार द्वारा लड़की में भरे जाते हैं, क्योंकि वह भी वैसे ही जन्म लेती है जैसे कि पुरुष और उसमें भी वे सभी क्षमताएं, इच्छाएं, गुण होते हैं जो कि किसी लड़के में. 1947 का वर्ष था, जब सीमोन ने अपने महान ग्रंथ ‘द सेकेंड सेक्स' पर काम शुरू किया. जिस समय यह पुस्तक प्रकाशित हुई, सीमोन स्वयं को नारीवादी यानी पुरुषों के बीच स्त्री की स्वाभाविक स्थिति या यूं कहिए कि स्त्री के वास्तविक और बुनियादी अधिकारों की समर्थक नहीं मानती थीं, मगर वक्त के साथ उन्हें समझ में आने लगा कि यह आधी दुनिया की गुलामी का सवाल है, जिसमें अमीर-गरीब हर जाति और हर देश की महिला जकड़ी हुई है. कोई स्त्री मुक्त नहीं. सिमोन द बोवुआर की पुस्‍तक ‘द सेकेंड सेक्स’ आज भी विश्‍व भर की करोड़ों महिलाओं के लिए प्रकाश-स्‍तंभ की तरह है. सिमोन का मानना था की पुरुष और महिलाओं के बीच के जैविक अंतर को नज़रअंदाज़ नहीं किया जाना चाहिए. वे कहती हैं कि महिलाओं और पुरुषों के बीच जैविक अंतर के आधार पर महिलाओं को दबाना बहुत ही अन्यायपूर्ण और अनैतिक है और इसी तथ्य को लेकर सिमोन ने महान दार्शनिक प्लेटो का भी विरोध किया था. द सेकेंड सेक्स के अलावा सिमोन की द मेंडारिंस, ऑल मेन आर मोर्टल, ऑल सेड एंड डन, द कमिंग ऑफ एज, ए वेरी ईजी डेथ, वूमन डिस्ट्रॉयड, द ब्लड ऑफ अदर्स आदि प्रमुख पुस्तकें हैं. 1949 में उनके आलोचकों ने उन्हें महिला विरोधी, मात्र विरोधी और विवाह विरोधी बताया था. लेकिन वे ही थीं जिन्होंने महिलाओं को भी सामान्य इंसान समझा जाए, उन्हें स्वतंत्र व्यक्तित्व माना जाए इसके बारे में अपना दर्शन लिखा था. और शायद यही वजह है कि 'औरतनामा' के इस खास कार्यक्रम में पत्रकार, अनुवादक, लेखक श्रुति अग्रवाल ने सिमोन द बोउआर के जीवन और लेखनी पर बातें की हैं.