नया ग़म देके जाता है कभी... Abdul Rehman Mansoor | तेरी खुशबू अभी रूमाल में है | Sanjeev Paliwal | Tak Live Video

नया ग़म देके जाता है कभी... Abdul Rehman Mansoor | तेरी खुशबू अभी रूमाल में है | Sanjeev Paliwal

मेरे दिल को दुखाता है कभी कोई कभी कोई

नया ग़म देके जाता है कभी कोई कभी कोई


सियासी खेल के मोहरे हैं ये मुफ़लिस इन्हें यारों

बिसातों पर सजाता है कभी कोई कभी कोई


ज़रा सा वक्त क्या बदला सभी के पर निकल आये

हमें आंखें दिखाता है कभी कोई कभी कोई


करें दिल की हिफ़ाज़त दोस्तों आखिर कहां तक हम

ये शीशा तोड़ जाता है कभी कोई कभी कोई


हमारे प्यार के दुश्मन हमें मिलने नहीं देते

उन्हें पट्टी पढ़ाता है कभी कोई कभी कोई... यह ग़ज़ल अब्दुल रहमान मंसूर के ग़ज़ल- संग्रह 'तेरी खुशबू अभी रूमाल में है' से ली गई है, जिसका संपादन ओम निश्चल ने किया. इस संग्रह को सर्वभाषा ट्रस्ट ने 'सर्वभाषा ग़ज़ल सीरीज़' के तहत प्रकाशित किया है. कुल 120 पृष्ठों के इस संग्रह का मूल्य 199 रुपए है. अपनी आवाज़ से कविताओं, कहानियों को एक उम्दा स्वरूप देने वाले वरिष्ठ पत्रकार और लेखक संजीव पालीवाल से सुनिए इस संग्रह की चुनिंदा ग़ज़लें सिर्फ़ साहित्य तक पर.